हर बार मैं
आसमां से
ज़मी पे गिरता हूँ
और यूँ ही
अनजानी राहों में
भटकता फिरता हूँ,
मंजिलें नहीं
जिन राहों की
न जाने क्यों
मैं उन्ही राहों में
मंजिलें ढूँढा करता हूँ,
आज तक
जितने भी सपने टूटे
न जाने क्यों
मैं उन सपनों को
सपनों में ही
जोड़ा करता हूँ;
जाने क्यों
मैं, हर बार
आसमान से
ज़मीं पे गिरता हूँ
गिरता हूँ,
और हर बार
टूटता हूँ
फिर भी
गिर कर
हर बार
उठता हूँ.
फिर भी
गिर कर
हर बार
उठता हूँ.

